“नवरात्रि” पर विशेष,पाँचवा दिन भगवती “स्कन्दमाता” को समर्पित

सफल वार्ता

आज का संदेश
सिंहासनगता नित्यं, पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी,स्कन्दमाता यशस्विनी।।
नवरात्र का पाँचवा दिन भगवती “स्कन्दमाता” को समर्पित है। नवरात्रि की नौ देवियों में ही नारी का सम्पूर्ण जीवन निहित है। गर्भधारण करके जो “कूष्माण्डा” कहलाती है वही पुत्र को जन्म जन्म देकर “स्कन्दमाता” हो जाती है, जो मातृत्व का अवतार है। लोग बहुत प्रेम से माता स्कन्दमाता का पूजन करके सुख-समृद्धि की कामना करता है। माता वह शब्द है जिसके बिना संसार की परिकल्पना करना ही व्यर्थ है। एक मां अपने पुत्र को गर्भधारण करने से लेकर जन्म देने तक कितने कष्ट उठाती है यह एक माँ ही समझ सकती है। फिर पुत्र का लालन पालन करना भी किसी तपस्या से कम नहीं होता। एक माँ की सबसे बड़ी कामना होती है कि वह अपने पुत्र का विवाह करे और एक चाँद सी बहू घर में पदार्पण करे। वह शुभ समय जब उसके जीवन में आता है तो स्वयं को धन्य मानती है और बड़े हर्षोल्लास से बहू का स्वागत करती है, आरती उतारकर घर में प्रवेश कराती है। परन्तु माँ के स्वप्नों पर तुषारापात तब होता है जब वही बहू उसे कुछ भी नहीं समझती और बात बात में झगड़ने लगने लगती है। और एक माँ स्वयं को तब मरा हुआ मान लेती जब उसका वह पुत्र (जिसके लिए उसने रात रात भर जाग गुजारा होता है ) भी पत्नी की ही बात मानकर अपने माँ का ही दोष देने लगता है। और फिर प्रारम्भ होता है एक माँ का नारकीय जीवन। पग पग पर तिरस्कृत होती हुई भी वह अपने पुत्र के लिए मंगलकामना ही करती रहती है। कुपुत्रो जायेत् क्वचिदपि, कुमाता न भवति”—-पुत्र कुपुत्र हो सकता है पर माता कभी कुमाता नहीं होती है।

मैं पी एन पांडेय ये कहना चाहता हूँ कि आज भी यदि समाज में दृष्टि दौड़ाई जाय तो यही देखने को मिलता है कि पुत्र कितना भी कष्ट दे, अपमान करे परन्तु माता कभी अपने पुत्र का अनिष्ट सोंच भी नहीं सकती है। एक दिन ऐसा भी आता है जब बहू कह देती है कि मैं इनके साथ नहीं रह पाऊँगी, और पुत्र माँ को वृद्धाश्रम पहुँचा देता है। वह मूर्ख यह भी नहीं सोंच पाता कि यही वह शक्ति है जिसकी तपस्या स्वरूप उसने इस संसार का दर्शन पाया है। अपनी माता को घर से निष्कासित करके वह जब मन्दिर पहुँचकर “स्कन्दमाता” का पूजन करता है तो उसकी मूर्खता पर अनायास हंसी ही लगती है। लोग कहते हैं कि माँ के चरणों के नीचे स्वर्ग होता है। अपने स्वर्ग जाने के स्रोत को तिरस्कृत करके जब मनुष्य स्कन्दमाता का पूजन करके स्वर्ग की कामना करता है, तो सोंचो कि भगवती आपकी कितनी विनती स्वीकार करेंगी आप उन्ही के अंश मातृशक्ति को अनदेखा करके उन्हीं से कृपा की कामना करेंगे तो क्या वह आपकी कामना पूरी करेंगी ? कदापि नहीं। क्योंकि जब एक माँ के हृदय में आपने शूल चुभा दिया तो वह शूल सीधा आदिशक्ति भवानी के ही हृदय को भेदता है। फिर सुख कहाँ से पायेंगे। यदि माँ स्कन्दमाता की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको सबसे पहले अपनी माँ का सम्मान करना होगा। यदि वह कराहती रहे और आप उसे एक सूखी रोटी न देकर भगवती को पंचमेवे -मिष्ठान्नों का भोग लगायेंगे तो माँ प्रसन्न न होकरके आप पर कुपित ही होगी।

अत: प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि अपनी जन्मदात्री माँ की पूजा न कर पायें तो सम्मान तो कर ही सकते हैं , यह संकल्प आज सबको लेना ही पड़ेगा अन्यथा पूजन करना व्यर्थ ही है।

परमानंद पांडेय
जी बी सदस्य /संयोजक
कार्यालय प्रमुख शाखा
लखनऊ /प्रयागराज/
कानपुर/बाराबंकी/गोरखपुर
मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच

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