अयोध्या फैसले के दिन क्या हो सकता है?

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मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच न्यायाधीशों की एक संविधान पीठ 6 अगस्त से लगातार इस मामले की सुनवाई कर रही है. 7 अक्तूबर को सुनवाई पूरी हो जाएगी. ऐसी संभावना है कि इसके लगभग एक महीने बाद इस मामले में कोई महत्वपूर्ण फ़ैसला आ सकता है. माना जा रहा है कि अयोध्या भूमि विवाद पर चार से 15 नवंबर के बीच सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आ जाएगा. इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय संवैधानिक बेंच रोज़ाना कर रही है. क्योकि जस्टिस गोगोई 17 नवंबर 2019 को सेवानिवृत्त हो रहे हैं. अगर मुख्य न्यायाधीश 17 नवंबर तक अयोध्या मामले पर फैसला नहीं देते हैं तो फिर इस मामले की सुनवाई नए सिरे से एक नई बेंच के सामने होगी.
हालांकि इसकी संभावना कम ही दिखाई दे रही है.

मामले में ये तय किया जाना है कि क्या पहले वहाँ कोई हिंदू मंदिर था जिसे तोड़कर या संरचना बदल कर उसे मस्जिद का रूप दिया गया था. हिंदुओं की धारणा के अनुसार जिस जगह बाबरी मस्जिद थी वो हिंदू देवता राम का जन्मस्थान है. छह दिसम्बर 1992 के बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया था. इसके बाद ज़मीन पर स्वामित्व विवाद से संबंधित एक मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर किया गया.

इस मामले में हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने 30 सितम्बर 2010 को 2.77 एकड़ की ज़मीन पर अपना फ़ैसला सुनाया. फ़ैसले के अनुसार ज़मीन एक तिहाई हिस्सा राम लला को जाएगा जिसका प्रतिनिधित्व हिंदू महासभा कर रही है, दूसरा एक तिहाई हिस्सा सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को और बाकी एक तिहाई निर्मोही अखाड़ा को दिया जाएगा.

अयोध्या फैसला पांच सदस्यों वाली संविधान पीठ करेगी.
हो सकता है कि सर्वोच्च अदालत इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले को ही बरक़रार रखे और ये भी हो सकता है कि वो इस ज़मीन को अलग अलग बांट दे. पांचों जज उस दिन अपने फ़ैसले को एक एक कर पढ़ेंगे. मुमकिन है कि चीफ़ जस्टिस इसकी शुरुआत करेंगे. “पूरी संभावना है कि फैसले के दिन अदालत में भारी गहमागहमी रहेगी. पांच जज कोर्ट नंबर वन में आएंगे और अपने फैसले का संबंधित हिस्सा पढ़ेंगे और इसके बाद अपने चेंबरों में चले जाएंगे. उसके बाद सबकुछ इतिहास होगा.”
साल 2011 में हिंदू और मुस्लिम पक्षों ने इस फैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी.
सितंबर, 2010 के फ़ैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में विवादित 2.77 एकड़ भूमि को सभी तीन पक्षों – सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान – के बीच बराबर-बराबर बाँटने का आदेश दिया था. इस फैसले के बाद हिंदुओं को उस जगह मंदिर बनने की उम्मीद थी, जबकि मुस्लिम पक्ष ने मस्जिद को फिर से बनाए जाने की मांग की.

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