डॉक्टरों को मोदी सरकार से मिला क्या? जिन्होंने कोरोना का इलाज किया, जान भी गंवाई

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डॉक्टरों को मोदी सरकार से मिला क्या? जिन्होंने कोरोना का इलाज किया, जान भी गंवाई
बुरे वक़्त में उनके साथ खड़ा रहने के सरकार के वादे के बाद भी उनके साथ किस तरह का व्यवहार किया गया. महामारी की शुरुआत में स्वास्थ्यकर्मियों और उनके परिवारों की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से व्यक्तिगत तौर पर सराहना की गई. उनके इशारे पर आम नागरिक थाली पीटते और दीये जलाते नज़र आए और स्वास्थ्यकर्मियों पर सेना के हेलीकॉप्टर से फूलों की पंखुड़ियों की बारिश की गई.

यह समझने के लिए कि उन परिवारों की आज स्थिति कैसी है, अपनी महीनों की पड़ताल के दरम्यान डॉक्टरों, मेडिकल एसोसिएशन, पूर्व नौकरशाहों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ साथ ज़मीनी स्तर पर स्वास्थ्यकर्मियों के परिवारों तक पहुंची. इस पड़ताल में सूचना का अधिकार क़ानून 2005 के तहत सरकार के पास आवेदन देना और सार्वजनिक दस्तावेज़ों पर शोध करना भी शामिल है.

उत्तर प्रदेश के बरेली शहर के पास एक गांव है. वहां मालती से मुलाक़ात हुई. “स्वास्थ्य विभाग समेत कई लोगों के फ़ोन आए थे. दूसरे स्वास्थ्यकर्मी मुझसे मेरी मां की नौकरी पकड़ लेने का आग्रह कर रहे थे. जीवन बीमा के पैसे के बारे में भी बात हुई और वो सभी बहुत सहयोगी लग रहे थे. उन्होंने मुझसे नौकरी के लिए एक फ़ॉर्म भरने के लिए कहा, जो मैंने किया. लेकिन मुझे नहीं पता कि उसके बाद क्या हुआ.”

मालती की मां शांति देवी का निधन लगभग चार महीने पहले कोरोना वायरस के संपर्क में आने से हुआ था. वो मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता या आशा वर्कर (अधिकांश लोगों के बीच इसी नाम से पहचान) थीं. उनके परिवार ने बताया कि वो प्रशासन से एक से अधिक बार सहायता के लिए संपर्क कर चुके हैं.फिर भी, अब तक न तो मुआवज़ा मिला है और न ही नौकरी. 50 से कुछ अधिक उम्र की शांति देवी भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा का गांव के स्तर पर प्रतिनिधित्व करती थीं.

मुंबई में सुजाता भावे अपनी स्थिति को बेहतर बनाने की कोशिश कर रही हैं.
उनके पति डॉक्टर चितरंजन भावे कान, नाक, गले (ईएनटी) के एक प्राइवेट डॉक्टर थे. 01 जून, 2020 को कोरोना वायरस से उनका निधन हो गया.


डॉक्टर चितरंजन भावे


उनका परिवार बताता है, ”जब वे अपने मरीज़ों को देख रहे थे तब न तो कोई व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) थे और न ही कोविड से संबंधित कोई प्रशिक्षण ही प्रशासन की ओर से मुहैया कराया गया था.” सुजाता बताती हैं, ”शुरू-शुरू में वो अपने मरीज़ों को ऑनलाइन देख रहे थे, लेकिन इस तरह से मरीज़ों को देखने में वे कभी संतुष्ट नहीं होते थे क्योंकि वीडियो कॉल पर कान, नाक और गले की जांच करना मुश्किल था. वो हमसे कहते रहते कि मुझे जाना चाहिए और फिर उन्होंने फ़ैसला ले लिया कि वो जाएंगे.” मरीज़ों को व्यक्तिगत रूप से देखना शुरू करने के कुछ दिन बाद ही उनमें कोरोना के लक्षण दिखने लगे. उन्हें भर्ती करना पड़ा. उसके बाद उनका परिवार फिर उनसे कभी नहीं मिल सका. व्यथित परिवार ने जब मुआवज़ा मांगा तो इनकार कर दिया गया. क्योंकि मेरे पति सरकारी वॉर्ड में काम नहीं कर रहे थे और वास्तव में एक निजी क्लीनिक में मरीज़ों की सेवा कर रहे थे.

अब कोई किसी मरीज़ से कैसे उम्मीद करेगा कि वो अपने इलाज के लिए कहां जाए? कई मौके पर मरीज़ जब डॉक्टर के पास पहुंचता है तो वो ये जानता है कि वो कोरोना वायरस से संक्रमित है. निश्चित रूप से ऐसा नहीं है कि सरकारी डॉक्टरों ने ही वायरस का सामना किया प्राइवेट डॉक्टरों ने नहीं. यह अनुचित था… यह भेदभाव है. हम अपमानित महसूस कर रहे हैं.”

source bbc

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